DELED Childhood and Development of Children Important Questions

D.EL.ED / JBT / BSTC 1st Year v.v.imp. questions

Childhood and Development of Children
बाल्यावस्था तथा बालकों का विकास
(Paper-1, Course Code-101, 1st Year)

Q1. विकास का क्या अर्थ है ?
उत्तर – बालक में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों के फलस्वरूप होने वाली प्रगति ही विकास है, यह प्रगति शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आदि सभी क्षेत्रों से सम्बन्धित है। विकास एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है, जो सभी प्राणियों में गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक चलती रहती है। विकास की यह प्रक्रिया कभी तीव्र तो कभी मन्द गति से चलती रहती है। विकास के फलस्वरूप बालक में होने वाले क्रमिक परिवर्तन बालक को वातावरण के साथ समायोजन करना सिखाते हैं।

Q2. विकास की कोई एक परिभाषा लिजिए।
उत्तर – हरलॉक के अनुसार, “विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तनों से है, विकास की परिभाषा क्रमिक सम्बद्धतापूर्वक परिवर्तनों की प्रगतिपूर्ण श्रृंखला के रूप में दी जा सकती है। प्रगतिपूर्ण का अर्थ है कि परिवर्तन दिशात्मक (Directional) होते हैं तथा यह पृष्ठोन्मुख (Backward) की अपेक्षा अग्रोन्मुख (Forward) होते हैं।” हरलॉक का मानना है कि विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताओं एवम् नवीन योग्यताओं का उदय होता है।

Q3. सतत विकास का क्या अर्थ है ?
उत्तर – सतत विकास से अभिप्राय विकास की ऐसी प्रक्रिया से है, जिसमें बच्चा पुराने ज्ञान और पुराने कौशलों में नवीन ज्ञान और नवीन कौशलों के जुड़ने से धीरे-धीरे विकसित होता है। सतत विकास में क्रमिक अथवा धीरे-धीरे तथा संचित परिवर्तन जीवन भर होते रहते हैं, जिसमें विकास की प्रारम्भिक अवस्थाएँ उन कौशलों और योग्यताओं को आधार प्रदान करती हैं, जिनकी आवश्यकता आगामी अवस्थाओं में होती है। सतत विकास में प्रायः यह देखा जाता है कि संसार के सभी प्राणी कैसे एक चरण से दूसरे चरण में बढ़ते हैं।

Q4. साक्षात्कार क्या है ?
उत्तर – साक्षात्कार का अर्थ- साक्षात्कार बातचीत या सामान्य वार्तालाप करने का ही एक रूप है, किन्तु इसमें एक अन्तर यह होता है कि बातचीत या वार्तालाप बिना किसी उद्देश्य से भी किया जा सकता है। किन्तु जब वार्तालाप के पीछे कोई सुनिश्चित उद्देश्य छिपा हो तो वह साक्षात्कार का रूप धारण कर लेता है। यद्यपि प्रदत्त एकत्रीकरण हेतु निरीक्षण तथा प्रश्नावली विधियों का अधिकतर प्रयोग होता है, परन्तु अनेक अवसरों पर निरीक्षण के साथ-साथ साक्षात्कार द्वारा भी प्रदत्त एकत्रित किए जाते हैं। बाल विकास में साक्षात्कार विधि का उपयोग तभी सम्भव है, जब बच्चे समस्याओं को पूर्ण रूप से समझने व व्यक्त करने में सक्षम हो।

Q5. बच्चों के बारे में परावर्तक पत्रिका किसे कहते हैं ?
उत्तर – बच्चों से सम्बन्धित परावर्तक पत्रिका से अभिप्राय ऐसी नोट चुक अथवा कागज के टुकड़े से होता है, जिसका प्रयोग बालक स्वयम् के विचारों को लिखने के लिए करता है। इस प्रकार के पत्रिका-लेखन से बालकों में अधि-संज्ञानात्मक कौशलों के विकास को प्रोत्साहित किया जा सकता है। इस पत्रिका द्वारा बालक स्वयम् का मूल्यांकन करने में सक्षम होता है तथा स्वयम् के विचारों का मूल्यांकन करने की प्रक्रिया उन छात्रों हेतु विशेष रूप से सहायक होती है, जो नये-नये संप्रत्ययों को अभी सीख ही रहे होते हैं ।

Q6. आकस्मिक निरीक्षण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – आकस्मिक निरीक्षण अभिलेख से अभिप्राय विद्यार्थियों द्वारा लिखी डायरी, शिक्षकों द्वारा तैयार किए घटनावृत्त और संचित अभिलेख कार्डों से हैं। अतः आकस्मिक निरीक्षण अभिलेख किसी शिक्षक द्वारा निरीक्षण किया गया किसी विद्यार्थी के व्यवहार तथा व्यक्तित्व का वस्तुनिष्ठ वर्णन है। यह अभिलेख नियमित निरीक्षण का परिणाम है। इसे अनौपचारिक अवलोकन भी कहा जाता है।

Q7. यौन भूमिकाओं का क्या अर्थ है ?
उत्तर – यौन भूमिकाओं से अभिप्राय सामाजिक और व्यवहारात्मक मानकों के ऐसे समूह से है, जिन्हें किसी विशिष्ट संस्कृति के सन्दर्भ में विशिष्ट यौन के लिए सामाजिक रूप में उपयुक्त माना जाता है और जो विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न समयों में भिन्नता दिखाते हों।
इस राय में भिन्नता है कि व्यवहार व्यक्तित्व में अवलोकित यौन अन्तर सांस्कृतिक कारकों या सामाजिक कारकों की वजह से होते हैं अथवा जैविक और शारीरिक की वजह से। आमतौर पर यौन भूमिका का सम्बन्ध उन विशेषताओं के समूह से होता है, जो नर और मादा में अन्तर करे, जो जैविक यौन को या यौन पहचान को दर्शाए। यौन पहचान यौन या उसका अभाव है, एक व्यक्ति जैसी स्वयम् की पहचान करता है, यह आवश्यक नहीं कि यह जैविक यौन पर आधारित हो।

Q8. रूढ़ियुक्तियाँ क्या होती हैं ?
उत्तर – रूढ़ियुक्ति शब्द का प्रयोग वस्तुओं और घटनाओं के अत्यधिक सामान्यीकृत तथा अत्यधिक सरलीकृत सम्प्रत्यात्मक वर्गों के प्रत्यक्षीकरण के लिए किया जाता है। सामाजिक जीवन में रूढ़ियों अथवा रूढ़ियुक्तियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। समाज मनोविज्ञान में इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम लिपमैन ने किया था। उसके अनुसार रूढ़ियों से तात्पर्य तो मन पर बने विचारों व अभिवृत्तियों के चित्रों से होता है। रूढ़ियुक्तियाँ ऐसे विचार तथा प्रवृत्तियाँ हैं जो मस्तिष्क में चित्र जाग्रत कर देते हैं। ये विभिन्न प्रजातियों के मध्य भिन्नता को जन्मजात मानकर बनाई जाती हैं।

Q9. लगाव का क्या अर्थ है?
उत्तर – लगाव से अभिप्राय है- संवेगात्मक सम्बन्ध। लगाव के सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय बाऊलबी (Bowlby) को जाता है। बाऊलबी एक ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक थे। उनके अनुसार, ‘लगाव मानवों के बीच सदा रहने वाली मनोवैज्ञानिक सम्बन्धता है।
जन्म के पश्चात् बच्चों के मानसिक विकास पर बड़ों का या बड़े बच्चों का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। परिवार के प्रौढ़ या बड़े सदस्य बच्चे के विकास में सहायक होते हैं। वे उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। वे बच्चे को सामाजिक अन्तःक्रिया के अवसर भी प्रदान करते रहते हैं। फलतः बच्चों एवम् बड़ों में संवेगात्मक सम्बन्ध विकसित हो जाता है, इसे ही लगाव कहा जाता है।

Q10. व्यक्तित्व का क्या अर्थ है?
उत्तर – हिन्दी का व्यक्तित्व शब्द अंग्रेजी भाषा के पर्सनेल्टी (Personality) शब्द का समानार्थक है। पर्सनेल्टी (Personality) शब्द लैटिन भाषा के परसोना (Persona) शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- मुखौटा या नकली चेहरा। प्राचीन काल में व्यक्तित्व शब्द से अभिप्राय व्यक्ति की बाहरी शारीरिक रचना, रंग रूप, वेशभूषा आदि से था। वर्तमान में भी एक सामान्य या अशिक्षित व्यक्ति व्यक्तित्व का ऐसा ही अर्थ लगाते हैं। लेकिन मनोविज्ञान में ऐसी साधारण विचारधाराओं को कोई स्थान नहीं दिया जाता। मनोविज्ञान के अनुसार व्यक्तित्व को समझने अथवा व्यक्तित्व का निर्धारण करने के लिए अनेक कारक या पक्ष अपनी-अपनी भूमिका अदा करते हैं।

Q11. बाल्यावस्था से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – शैशवावस्था के पश्चात् बच्चा जिस अवस्था में प्रवेश करता है, उसे बाल्यकाल (Childhood stage) कहते हैं परन्तु आज तक इस संसार में कोई भी व्यक्ति विद्वान, मनोवैज्ञानिक या वैज्ञानिक नहीं हुआ है जो यह बता सके कि आज या इस सप्ताह या फिर इस महीने में यह बच्चा शैशवकाल से बाल्यकाल में प्रवेश करेगा। फिर भी सुविधा के लिए मनोवैज्ञानिकों तथा वैज्ञानिकों ने 5 वर्ष से लेकर 12 वर्ष के मध्य की आयु को बाल्यकाल माना है। परन्तु प्रश्न वही है कि क्या 5 वें वर्ष में प्रवेश करते ही बच्चा एकदम से शैशव से निकलकर बाल्यकाल में प्रवेश कर जाता है या फिर 18 वर्ष के पूर्ण होने पर अगले ही दिन वह किशोर हो जाएगा। यह बहुत मुश्किल है। इसलिए बाल्यकाल को प्रकट करने वाली विशेषताओं जैसे शारीरिक, संवेगात्मक, सामाजिक, बौद्धिक तथा मानसिक विकास को ध्यान में रखते हुए हम यह निश्चित करते हैं कि शैशव अब बाल्यकाल में बदल चुका है। यह अवस्था बड़ी ही नाजुक होती है। इसे मिथ्या परिपक्वता की अवस्था (Pseudo Maturity) की अवस्था के रूप में जाना जाता है। इस अवस्था में बच्चा अपने वातावरण को समझते हुए उससे सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है। वह अब मानसिक रूप से भी थोड़ा स्थिर यानी गंभीर होने लगता है। वह अपनी पहचान को निश्चित करने के लिए सामाजिक ताने-बाने को समझने का प्रयास करता है। इस अवस्था को गैंग ऐज (Gang-age) के नाम से भी जाना जाता है।

Q12. बाल्यावस्था में बालकों में किन-किन पक्षों का विकास होता है ?
उत्तर – बाल्यावस्था में जो प्रमुख विकास दिखाई देता है उसमें निम्नलिखित पक्ष शामिल होते हैं :
(1) स्कूल की परिस्थितियों में बच्चे ईर्ष्या का दृष्टिकोण रखते हैं। वे अपनी कक्षा के अन्य विद्यार्थियों से उनकी सफलता पर ईर्ष्या करते हैं।
(2) घर पर भी वे उन छोटे या बड़े भाई-बहिनों से ईर्ष्या करते हैं, जिनकी तरफ उनके माता-पिता अधिक ध्यान देते हैं।
(3) प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे गर्व अनुभव करते हैं जब वे कोई ‘चुटकुला’ सुना देते हैं और समूह में उसे सबसे अच्छा ‘जोकर’ मान लिया जाता है।
(4) उत्तर-बाल्यावस्था में बच्चे संकेतों और चिह्नों (Symbols and Signs) को समझने लगते हैं।
(5) घरेलू समस्याएं, बुरा स्वास्थ्य, वास्तविक या काल्पनिक. कुठाएँ (Real or imagined frustrations) आदि भी बालक को प्रभावित करते हैं।

Q13. वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – वैश्वीकरण का अर्थ- आज विश्व में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं। ये परिवर्तन सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, तकनीकी तथा शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है। वास्तव में वैश्वीकरण विश्व के विभिन्न देशों में परस्पर अन्तः क्रिया (interaction) की प्रक्रिया है। यह अन्तः क्रिया विचारों, सामाजिक मूल्यों, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति तथा तकनीकी आदि सभी क्षेत्रों में हो रही है और इसका कारण है कि सूचना व तकनीकी के क्षेत्र में विकास।
वैश्वीकरण के संदर्भ में परिभाषा निम्नलिखित है-
1. नाइट (Knight) के अनुसार, “वैश्वीकरण तकनीकी, वित्त, व्यापार, ज्ञान मूल्यों तथा विचारों की सीमा पार तक बढ़ते प्रवाह के साथ संबंध रखता है।”
2. लेचनर (Lechner) के अनुसार, “वैश्वीकरण का अर्थ है वैश्विक संबंधों का विस्तार, सामाजिक जीवन का विश्व स्तर पर संगठन तथा विश्व चेतना का विकास।”

Q14. वैश्वीकरण के क्या लाभ है ?
उत्तर – वैश्वीकरण से लाभ निम्नलिखित हैं :
(i) विश्व परिवार की भावना का विकास
(ii) प्रतियोगिता की भावना का विकास
(iii) वैश्विक जनसंचार
(iv) अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन को बढ़ावा
(v) शैक्षिक आदान-प्रदान
(vi) सांस्कृतिक सहिष्णुता का विकास
(vii) प्रजातांत्रिक मूल्यों का विकास
(viii) अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान
(ix) धर्म निरपेक्ष मूल्यों का विकास
(x) रोजगार के अवसर
(xi) जनशक्ति की गतिशीलता को बढ़ावा
(xii) तकनीकी विकास
(xiii) मुक्त व्यापार को बढ़ावा
(xiv) आर्थिक विकास में सहायक
(xv) सांस्कृतिक विरासत का आदान-प्रदान।

Q15. वैश्वीकरण की हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर – वैश्वीकरण से हानियाँ निम्नलिखित हैं :
(i) प्रतिभा पलायन
(ii) संस्कृति पर प्रहार
(iii) महँगी शिक्षा
(iv) अध्यापक तथा विद्यार्थी में दूरियाँ
(v) मूल्यों में गिरावट
(vi) विकसित एवं विकासशील देशों की आय में अन्तर
(vii) धन का असमान वितरण।
(viii) धीमी समाजीकरण की प्रक्रिया
(ix) हिन्दी भाषा की उपेक्षा
(x) सांस्कृतिक मूल्यों में ह्रास
(xi) नैतिक मूल्यों का पतन
(xii) गरीब राष्ट्रों का शोषण
(xiii) विकासशील राष्ट्रों को व्यापारिक क्षेत्र समझना

Q16. सामान्य बालक से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – सामान्य शब्द की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की जा सकती है, जैसे- किसी माप, प्रतिमान या प्रतिरूप के अनुसार किसी वस्तु या मनुष्य के व्यवहार का होना सामान्य कहलायेगा। उदाहरणार्थ- एक व्यक्ति किसी समाज के नियमों के अनुसार कार्य करता है तो उसे सामाजिक रूप से सामान्य कहा जा सकता है। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति अपनी संस्कृति के अनुसार कार्य करता है तो वह सांस्कृतिक रूप से सामान्य कहलायेगा। व्यक्ति के व्यवहार के अनुरूप ही उसे सामान्य या असामान्य की संज्ञा दी जाती है। किसी भी बालक की यह पहचान करने के लिए कि वह सामान्य है या नहीं, कुछ विशेषताओं पर विचार करना अति आवश्यक है। इन्हीं विशेषताओं के आधार पर हम सामान्य बालक की पहचान कर सकते हैं। अतः सामान्य बालक की यदि हमने पहचान करनी है तो निम्नलिखित विशेषताओं को जानना अति आवश्यक होता है।

Q17. अशक्तता (Disability) से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर – अशक्तता का अर्थ है बालक के जीवन में किसी विशेष पहलू के लक्षणों के कारण उसे सामान्य से असामान्य की ओर ले जाना है। असमानता सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। ऐसे लक्षणों वाले बालकों को ‘विशिष्ट बालक’ की संज्ञा दी गई है। विशिष्ट बालकों के संदर्भ में भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपनी-अपनी परिभाषाएँ दी हैं।

Q18. विशिष्ट बच्चों से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – प्रत्येक विद्यालय में जहाँ सामान्य बालक होते हैं वहाँ बहुत से शिक्षार्थी ऐसे भी होते हैं जो किसी न किसी रूप में अन्य शिक्षार्थियों से विशिष्ट होते हैं। यह विशिष्टता शारीरिक अथवा मानसिक किसी भी प्रकार की हो सकती है। उदाहरण के लिए, कुछ विद्यार्थी विशिष्ट रूप से लम्बे, या छोटे, दुर्बल या बलवान हो सकते हैं। यह विशिष्टता सामान्य से आगे की ओर भी मिल सकती है और पिछड़े हुए भी। ये दोनों प्रकार के बालक विशिष्ट होते हैं जो बालक शारीरिक, बौद्धिक, मानसिक तथा सामाजिक रूप से सामान्य बालकों से या तो आगे होते हैं या पीछे, ऐसे बालकों को विशिष्ट बालक कहा जाता है। अतः देखा जाता है कि विशिष्ट बालक अपनी आयु के सामान्य बालकों को कुछ अपनी खास विशेषताओं या खास कमियों के कारण क्रमशः या तो अधिक प्रतिभाशाली होते हैं या मंदबुद्धि वाले क्रो एवं क्रो ने विशिष्ट शब्द को स्पष्ट करते हुए कहा कि “विशिष्ट शब्द ऐसे गुण के लिए प्रयुक्त किया जाता है, जिससे वह विशिष्ट व्यक्ति सामान्य व्यक्ति से भिन्न होता है। उसमें यह विशिष्टता इतनी महत्त्वपूर्ण होती है कि उसके लिए वह अपने साथियों से विशेष ध्यान (attention) की माँग करती है और उससे उसकी व्यवहार अनुक्रियाएँ तथा क्रियाएं प्रभावित होती हैं। जे. टी. हंट (J. T. Hunt) के अनुसार, “विशिष्ट बालक वे हैं जो शारीरिक, संवेगात्मक या सामाजिक विशेषताओं में सामान्य बालकों से इतने पृथक् हैं कि उनकी क्षमताओं के अधिकतम विकास के लिए विशिष्ट शिक्षा सेवाओं की आवश्यकता होती है।”

Q19. प्रतिभाशाली बालकों के बारे में आप क्या जानते हैं।
उत्तर – प्रतिभाशाली बालक (Gifted Children) वे बच्चे होते हैं जो मानसिक रूप से अपनी आयु स्तर के बच्चों से किसी भी योग्यता में आगे होते हैं। इनकी बुद्धिलब्धि सामान्य से अधिक होती है। इन बच्चों में शैक्षिक योग्यता और उपलब्धि का स्तर भी ऊँचा पाया जाता है। ऐसे बच्चे प्रत्येक काम सामान्य बच्चों से जल्दी और अधिक कुशलतापूर्वक कर सकते हैं। इनका ध्यान-विस्तार अधिक होता है। ये सामान्य बुद्धि का अधिक प्रयोग करते हैं। इनकी रुचियाँ अधिक और विस्तृत होती हैं। इनकी स्मरण तथा निर्णय शक्ति भी काफी तेज होती है। ये बच्चे कठिन मानसिक कार्य को आसानी से पूरा करने में सफल होते हैं। इन बच्चों में मौलिक गुण और प्रवृत्ति विद्यमान होती है। इनकी पहचान बुद्धि-परीक्षण (Intelligence test), अभिरुचि परीक्षण (Aptitude test), उपलब्धि परीक्षण (Achievement test) के द्वारा की जा सकती है। इनकी पहचान में माता-पिता की रिपोर्ट तथा अध्यापक के मत भी काफी महत्त्व रखते हैं। ऐसे बच्चों की सीखने की गति बहुत तेज होती है। वे सीखी हुई बातों को लम्बे समय तक याद रखकर अन्य स्थितियों में उनका प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे बच्चों की पहचान स्कूल के आकस्मिक तथा संचयी लेखों के द्वारा की जा सकती है।

Q20. अपराधी बच्चों की पहचान कैसे की जा सकती है ?
उत्तर – ये बच्चे वे बच्चे होते हैं जिनमें बचपन से ही अपराध करने और गैरकानूनी काम करने की प्रवृत्ति पाई जाती है, जैसे- चोरी करना, घर से भाग जाना, नशा करना, जुआ खेलना आदि।
निम्नलिखित विशेषताओं के आधार पर इनकी पहचान की जा सकती है – ऐसे बच्चे समाज के नियमों तथा आदर्शों की अवहेलना करते हैं। ऐसे बच्चों के व्यवहार पर अधिकतर वातावरण का प्रभाव होता है। ये बच्चे वैसे तो सामान्य होते हैं परन्तु अपने आपको कई बार वातावरण से समायोजित नहीं कर पाते और असामान्य से लगने लगते हैं। इन बच्चों में अपराध करने की प्रवृत्ति वंशागत भी पाई जाती है

Q21. पिछड़े बालकों के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर – बालकों के माता-पिता तथा शिक्षक प्रायः यह अनुभव करते हैं कि कुछ बालक अपने आयु-स्तर के अनुरूप प्रगति नहीं कर पाते तथा सामान्य कक्षाओं में अरुचि का प्रदर्शन करते हैं। शिक्षा या किसी विशेष विषय के प्रति वे उदासीन रहते हैं तथा निम्न-उपलब्धि वाले वे सभी बालक अपनी आयु-स्तर के समान क्षमता वाले अन्य बालकों से शैक्षिक रूप से पिछड़ जाते हैं। इस प्रकार के बालकों को पिछड़े बालक या धीरे-धीरे सीखने वाले अथवा मंदबुद्धि वाले बालक कहते हैं। किसी बालक को पिछड़े बालक की श्रेणी में रखने का आधार वातावरण संबंधी तुलनात्मक पिछड़ापन होता है।

Q22. मन्द बुद्धि बालकों से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर – कुछ बालक मानसिक रूप से उप-सामान्य (Sub-normal) होते हैं। ऐसे उप-सामान्य बालक शिक्षा में अध्यापक के शिक्षा कार्य को समझने में असमर्थ होते हैं या आसानी से समझ नहीं पाते। ऐसे बालकों का मन्द-बुद्धि बच्चों की श्रेणी में रखा जाता है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि ऐसे बालकों की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
बालकों को उनके बुद्धिलब्धि (intelligence Quotient) के आधार पर ही वर्गीकृत किया जाता है। टरमन (Terman) के अनुसार 70 स कम बुद्धिलब्धि (I.Q.) वाले बालक को ‘मन्द बुद्धि’ बालक कहा गया है। ऐसे बालक किसी भी शारीरिक तथा मानसिक रोग के कारण मन्द बुद्धि का प्रदर्शन करते हैं और अपनी आयु के स्तर के अनुसार किसी कार्य का करने में असमर्थ होते हैं। इस दोष का परिणाम यह होता है कि उनमें कई प्रकार की हीन-ग्रन्थियाँ (Inferiority Complex) पैदा हो जाती हैं। मन्द-बुद्धि बालक हर ओर से उपेक्षित (Neglected) रहते हैं।
मानसिक रूप से पिछड़े ऐसे बालक संवेगात्मक स्थिरता, सामाजिक परिपवक्ता तथा बौद्धिक प्रवीणता में भी पिछड़े रहते हैं। कई बार ऐसे बच्चे शारीरिक रूप से तो परिपक्व हो जाते हैं, लेकिन उनका सामाजिक और संवेगात्मक व्यवहार उनकी आयु के बच्चों से बहुत पिछड़ा हुआ होता है।

Q23. शारीरिक रूप से अपंग बालकों के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर – शारीरिक रूप से अपंग वे बच्चे कहलाते हैं जो किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रिया को पूर्णरूप से करने में असमर्थ होते हैं या जो अपाहिज या लूले लंगड़े होते हैं अथवा जिनकी माँसपेशियाँ और हड्डियाँ दोषपूर्ण ढंग से विकसित होती हैं। ऐसे बालकों में कोई न कोई शारीरिक अंग सम्बधित दोष होता है और जो उसे साधारण क्रियाओं में भाग लेने में बाधा डालता है। यह दोष अधिक और कम दोनों प्रकार का हो सकता है। इसके अतिरिक्त ऐसे बालकों के बुद्धिस्तर में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होती। ये सामान्य बालकों की भाँति कम बुद्धि के भी होते हैं और अधिक बुद्धि के भी। परन्तु इन बालकों को शरीर के अंगों के दोष के कारण जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के साथ समायोजन स्थापित करने में कठिनाई उठानी पड़ती है। इन बालकों को सामान्य बालकों के साथ शिक्षा दी जा सकती है परन्तु कक्षा में ऐसे बालकों को अन्य बालकों के मजाक व उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है, जिसके कारण उनमें हीनता की भावना, चिन्ता और हताश जैसे मानसिक लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।

Q24. सामाजीकरण की प्रकृति या अवधारणा क्या है ?
उत्तर – सामाजीकरण शब्द का प्रयोग सामाजिक अधिगम के अनुभवों के क्रम के सन्दर्भ में किया जाता है, जिसका परिणाम व्यक्ति के समाज के एकीकरण के रूप में सामने आता है। सामाजीकरण शब्द का प्रयोग सामाजिक अधिगम की लम्बी और जटिल प्रक्रिया का वर्णन करने हेतु भी किया जाता है, जिसके द्वारा एक शिशु का एक वयस्क के रूप में विकास होता है और वह समाज में समायोजित होकर उसका अंग बन जाता है। सामाजीकरण प्रक्रिया एकरूपता को प्रोत्साहित करती है तथा परम्परा से परिवर्तन या नवीन खोजों को निरूत्साहित करती है। सामाजीकरण एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।

Q25. परवरिश से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – परवरिश शब्द को विभिन्न सन्दर्भों में प्रयोग किया जाता है। मानव के सन्दर्भ में परवरिश बालक के जैविकीय माता-पिता के द्वारा की जाती है। इस परवरिश में सरकार तथा समाज भी अहम योगदान देते हैं। परवरिश किसी बालक को जन्म से प्रौढ़ावस्था तक खड़ा करने तथा उसे शिक्षित करने की एक प्रक्रिया है। यह सामान्यतः परिवार में माता-पिता द्वारा की जाती है। अतः परवरिश को हम दूसरे शब्दों में ऐसे की परिभाषित कर सकते हैं- प्राकृतिक माता-पिता द्वारा बच्चे का ध्यान रखकर पालन-पोषण और सुरक्षा करते हुए माता-पिता की भूमिका निभाना परवरिश कहलाता है।

Q26. क्रैच से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – कैच (Creche) शब्द फ्रेंच भाषा का एक शब्द है, जिसका अर्थ है- डे-केयर (Day Care) अर्थात् दिन भर देखभाल करना। कामकाजी माताओं को काम से जाने से पहले अपने छोटे बच्चे को ऐसी संस्था में छोड़कर जाना पड़ता है, जहाँ पर उसकी उचित देखभाल हो सके। ऐसी संस्था को ही क्रैच के नाम से जाना जाता है। क्रैच में 3 माह से लेकर 10 वर्ष तक के लड़के तथा 3 माह से लेकर 12 वर्ष तक की लड़कियों को दाखिल किया जाता है। क्रैच में बच्चों को बिस्तर, मुफ्त चिकित्सा सहायता एवम् खिलौने आदि प्रदान किए जाते हैं।

Q27. क्रैच के लाभ तथा हानियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर – कैच के लाभ :
1. क्रैच में आयु-अनुसार खिलौने व अन्य सामान उपलब्ध हो जाता है।
2. क्रैच में बच्चा विश्राम कर सकता है तथा वहां पर उद्दीपन प्रदान करने वाला वातावरण मिल जाता है।
3. क्रैच पर नजर रखना माता-पिता के लिए आसान होता है।
4. बच्चे को क्रैच में डालने के बाद माता-पिता की चिंता समाप्त हो जाती है।
5. बच्चा क्रैच में अपनी आयु वाले बच्चों के साथ अंतर्क्रिया करता है तथा आत्म-विश्वासी बनता है।

क्रैच की हानियाँ :
1. अधिकतर क्रैच रजिस्टर्ड नहीं होते और न ही वे निर्धारित मापदंडों का अनुसरण करते हैं।
2. क्रैच विशेष समय के बाद बंद हो जाते हैं। अतः शिफ्टों में कार्य करने वालों के लिए उपयोगी नहीं।
3. बीमार बच्चों से सम्पर्क हो सकता है जिस कारण आपका बच्चा भी बीमार हो सकता है।
4. जिस प्रकार की देखभाल आपके बच्चे को चाहिए कई बार कोई क्रैच वैसी सुविधा प्रदान कराने में असफल रहता है।
5. कई बार आपके बच्चे के बीमार होने पर आपको छुट्टी लेनी पड़ सकती है या सामानांतर व्यवस्था करके रखनी पड़ेगी।

Q28. प्रतिस्पर्धा से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – प्रतिस्पर्धा एक ऐसी प्रक्रिया होती है, जिससे बालक के समस्त सामाजिक विकास को गति प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया का आधार आत्म-अभिव्यक्ति होती है। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति खुद को अपने ही तरीके से अभिव्यक्त करना चाहता है। उसकी अपनी भावनाएँ, अपने विचार, अपना चिन्तन होता है, जिसे वह दूसरों के सामने अभिव्यक्त करने की इच्छा करता है। इसी अभिव्यक्ति की तुलनात्मक जाँच को प्रतिस्पर्धा शब्द द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना का विकास जन्म से 3 वर्ष के बाद होता है और वह प्रतिस्पर्धा की भावना बालक के आत्म-सम्मान या आत्म पहचान के विकसित होने के बाद उत्पन्न होनी शुरू होती है। प्रतिस्पर्धा का प्रभाव सकारात्मक व नकारात्मक दोनों हो सकते हैं।

Q29. सहयोग से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – समाजपक्षी व्यवहार के दुर्बल स्वरूप को सहयोग कहा जाता है। इस दुर्बल स्वरूप अथवा सहयोग में स्व-लाभ के तत्त्व विद्यमान होते हैं। समाज में अनेक सम्बन्धों के निर्धारण हेतु कोई न कोई आधार चाहिए। सहयोग उस आधार की भूमिका निभाता है। सहयोग के प्रक्रम में जो सहभागी होते है, वे सभी लाभ उठाते हैं तथा वांछित लक्ष्यों को अर्जित करने का प्रयास करते हैं। सहयोग एक सामाजिक प्रक्रिया है। इसमें दो या अधिक व्यक्ति या समूह संगठित होते हैं तथा संगठित होकर समान लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रयत्न करते हैं।

Q30. द्वंद्व से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – द्वंद तथा तनाव को सामान्यतः समान समझा जाता है, लेकिन इन दोनों में पर्याप्त अन्तर है। तनाव पहले उत्पन्न होता है तथा उसके परिणामस्वरूप द्वंद्व उत्पन्न होता है। तनाव एक चिंता की अवस्था है, जबकि द्वंद्व एक प्रकार की आक्रामकता की स्थिति है, यह स्थिति शाब्दिक अथवा शारीरिक दोनों स्वरूपों में सम्भव है, जब व्यक्तियों के दो समूह खुलेआम एक-दूसरे को गाली देते हैं या शारीरिक रूप से दिखाई देते हैं तब उसे द्वंद्व कहते हैं। द्वंद्व से कुंठा उत्पन्न होती है।

Q31. आक्रामकता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – आक्रामकता शब्द, एक प्रकार की समस्या का प्रतिनिधित्व करता है। यह शब्द सार्वभौमिक शब्द है, जिसका अर्थ जानना अति आवश्यक है। आरनोल्ड बास के अनुसार, “आक्रामकता एक ऐसा व्यवहार है जो दूसरों को हानि या कष्ट पहुँचाता है।” कुछ ऐसी ही परिभाषा चैपलिन ने भी दी है, “आक्रामकता से अभिप्राय दूसरों के प्रति प्रहार करना या हानि पहुंचाना, अनादर करना, उपहास या दुर्भावपूर्ण आरोप लगाना, सख्त दण्ड देना या परपीड़क व्यवहारों में लगे रहना है।” अतः आक्रामकता एक ऐसा व्यवहार है, जिसमें दूसरों को नुकसान पहुँचाया जाता है।

Q32. आखेदन या दबंगता क्या है ?
उत्तर – आखेदन या दबंगता एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा तंग करने का व्यवहार प्रदर्शित किया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया के मूल में आक्रामकता की भावना शामिल होती है। दबंगता की इस प्रक्रिया के तहत बड़े या शक्तिशाली बच्चे छोटे या कमजोर बच्चों का शारीरिक उत्पीड़न करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार का व्यवहार लड़कियों में कम पाया जाता है तथा लड़कों में अधिक। इस प्रकार का व्यवहार संतुलित समायोजन वाले बालकों में कम पाया जाता है तथा असंतुलित समायोजन वाले बच्चों में अधिकाधिक पाया जाता है।

 

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